कौन हैं नीम करोली बाबा के सबसे बड़े भक्त? हार्वर्ड में प्रोफेसर बनकर दुनिया में बाबा का संदेश फैलाया, श्री सिद्धि मां भी बनीं अनन्य शिष्या
क्या आप जानते हैं कि जिस नीम करोली बाबा से प्रेरणा लेकर एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया, उनका सबसे बड़ा शिष्य कौन है. स्टीव जॉब्स तो नहीं थे क्योंकि जब स्टीव जॉब्स नीम करोली बाबा के दर्शन करने आए तब तक बाबा इस दुनिया को छोड़ चुके थे लेकिन उनके आश्रम में पहुंचते ही स्टीव जॉब्स को अलौकिक प्रेरणा मिली और उन्होंने एप्पल की नींव रखी. नीम करोली बाबा के सबसे बड़े शिष्य थे रिचर्ड अल्बर्ट. रिचर्ड अल्बर्ट अमेरिका में प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे. 2019 में उनका निधन हो गया. उन्होंने ही बाबा के चमत्कार और उनके संदेशों को जग-जग तक पहुंचाया. वे दुनिया में आध्यात्मिक गुरु बनकर बाबा के सपनों को साकार किया. आइए उनके बारे में जानते हैं.
चेतना में स्थायी शांति के लिए भारत आए
रिचर्ड अल्बर्ट अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे. वे चेतना और मन की गहराइयों को समझने के लिए प्रयोग कर रहे थे. इसके लिए उन्होंने एल.एस.डी. और सोलोसाइबिन जैसे साइकेडेलिक पदार्थों पर भी शोध किया था. उन्हें महसूस हुआ कि ये पदार्थ केवल कुछ समय के लिए चेतना को बदलते हैं लेकिन स्थायी शांति नहीं देते. वे एक ऐसे स्थायी ज्ञान और सच्चे गुरु की तलाश में थे जो बिना किसी बाहरी पदार्थ के इंसान को आध्यात्मिक जागृति दे सके. इसी आत्म-साक्षात्कार और सत्य की खोज में वे 1967 में भारत आए. हालांकि इस कारण उन्हें हार्वर्ड छोड़ना पड़ा. भारत में कई जगह की यात्रा करने के बाद वे नीम करोली बाबा के आश्रम में आए और फिर यहीं के होकर रह गए. वे कैंची धाम में नीम करोली बाबा के अनन्य भक्त बन गए और बाबा ने उन्हें उनका नाम राम दास कर दिया.
भारत यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात भगवान दास नामक एक अन्य अमरीकी साधक से हुई, जो उन्हें उत्तराखंड के कैंची धाम नीम करोली बाबा के आश्रम ले गए. जब रिचर्ड अल्बर्ट पहली बार बाबा नीम करोली के सामने पहुंचे, तो बाबा ने बिना किसी के बताए उनसे उनके पारिवारिक जीवन और पिछली रात की गुप्त बातों का जिक्र कर दिया. बाबा ने उनसे कहा कि वे पिछली रात अमेरिका में अपनी मृत मां के बारे में सोच रहे थे. अपने मन के सबसे गहरे विचारों को बाबा द्वारा सटीक रूप से बताए जाने पर रिचर्ड अल्बर्ट हक्का-बक्का रह गए. उनका सारा बौद्धिक अहंकार खत्म हो गया और उन्हें महसूस हुआ कि वे किसी आम इंसान नहीं बल्कि एक दिव्य पुरुष के सामने खड़े हैं. वे तुरंत बाबा के चरणों में गिर पड़े.
फिर बाबा ने नाम दिया रामदास
बाबा नीम करोली ने रिचर्ड अल्बर्ट के समर्पित भाव को देखकर उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया. महाराज जी ने ही रिचर्ड अल्बर्ट को नया नाम रामदास दिया. इसका अर्थ है भगवान राम का सेवक. बाबा ने उन्हें प्रेम, सेवा और ईश्वर भक्ति के मार्ग पर चलने का उपदेश दिया. इसके बाद उन्होंने अपना पश्चिमी पहनावा छोड़कर धोती-कुर्ता धारण कर लिया और पूरी तरह से साधना में डूब गए.
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